Monday, 8 May 2017

ज़िना की तोहमत


ज़िना की तोहमत

* हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने जिन 7 हलाकत खेज़ गुनाहों से बचने को कहा है 1. शिर्क करना 2. जादू करना 3. क़त्ल करना 4. यतीम का माल खाना 5. सूद खाना 6. मैदाने जंग से भागना,उसमे एक ये भी है कि 7. किसी पाक दामन औरत पर इलज़ाम लगाना

📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 388
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 66

* अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान में इरशाद फरमाता है कि "और वो लोग जो पाक दामन औरतों पर इलज़ाम लगाते हैं फिर इस पर वो 4 गवाह ना लायें तो उनको 80 कोड़े मारो और उनकी गवाही कभी भी क़ुबूल ना करो कि वो लोग फासिक हैं" कुछ आगे इरशाद फरमाता है कि "बेशक वो लोग जो पाक दामन औरतों पर इलज़ाम लगाते हैं उन पर दुनिया और आखिरत में लाअनत भेजी गयी है और उनके लिए बड़ा अज़ाब है

📕 पारा 18,सूरह नूर,आयत 4-23

ये बीमारी तो आजकल बड़ी आम है जहां किसी लड़की को किसी से बात-चीत करते देखा फौरन उस पर इल्ज़ाम तराशी शुरू हो गई,फलां का फलां से चक्कर है फलां तो आवारा है फलां बदचलन है वगैरह वगैरह,इस्लाम के किसी भी मसले में अगर गवाही की ज़रूरत पड़ेगी तो 2 गवाह काफी हैं चाहे किसी के क़त्ल का मुक़दमा हो या कुछ भी,लेकिन अगर औरत पर ज़िना का इलज़ाम लगाया तो अब 2 गवाहों से काम नहीं चलेगा 4 गवाह चाहिये और चारों ने उस औरत को किसी मर्द के साथ इस तरह देखा हो जैसे सुई में धागा,अगर चारों ने इसी तरह मर्द व औरत को देखा तो जब तो वो ज़ानी होंगे और सज़ा के मुस्तहिक़,ज़िना की सजा ये है कि अगर ज़िना करने वाले शादी शुदा हैं तो संगसार कर दिया जाये यानि दोनों को पत्थर मार मारकर मार डाला जाये और अगर कुंवारे हों तो 100,100 कोड़े मारे जायें,ये सज़ा तब क़ायम होगी जब कि इस्लामी हुकूमत हो चूंकि हिंदुस्तान में इस्लामी हुकूमत नहीं है लिहाज़ा यहां सज़ा नहीं दी जा सकती ऐसे लोग तौबा करें,ये तो हुई ज़ानी की सज़ा और जिसने इलज़ाम लगाया अगर वो 4 गवाह ना पेश कर सका या गवाह तो आये मगर चारों ने मर्द व औरत को उस तरह नहीं देखा जिस तरह बयान किया गया तो इलज़ाम लगाने वाला झूठा साबित होगा और उस पर हद क़ायम होगी यानि 80 कोड़े उसको मारे जायेंगे,चूंकि सज़ा उसको भी नहीं दी जा सकती मगर वो हुक़ूक़ुल इबाद में गिरफ्तार हुआ तो उसका गुनाह सिर्फ तौबा से माफ ना होगा बल्कि उससे भी माफी मांगनी होगी जिस पर इलज़ाम लगाया है,हदीसे पाक में है कि

* बेशक आदमी ज़बान की बदौलत जहन्नम में इतना गिरता है कि जितना मशरिक और मग़रिब के दर्मियान फासला है

📕 अत्तरगीब वत्तरहीब,जिल्द 3,सफह 537

* ईमान वालों को चाहिये कि अच्छी बात बोलें या खामोश रहें

📕 मजमउज़ ज़वायेद,जिल्द 10,सफह 32

याद रहे औरत अगर बदकार भी है जब भी उस पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकते जब तक कि उसकी बदकारी को साबित करने के लिए 4 गवाह ना हों,लिहाज़ा मुसलमानों बात बात में किसी को ज़ानी या किसी को हरामी या किसी भी लड़के या लड़की पर ज़िना का इलज़ाम लगाना अगर चे मज़ाक में भी कहे जब भी हराम है गुनाहगार होगा लिहाज़ा तौबा करे और उससे माफी भी मांगे,हां मगर किसी को हराम ज़ादा कहने पर सरकारे आलाहज़रत फरमाते हैं कि "हराम ज़ादा कहने पर हद क़ायम नहीं होगी क्योंकि यहां इस लफ्ज़ से मुराद शरारती होता है मगर लड़की को हराम ज़ादी ना कहे

📕 अलमलफूज़,हिस्सा  4,सफह 14



ZEBNEWS

Friday, 5 May 2017

इल्मे दीन हिस्सा-2


हिस्सा-2  इल्मे दीन

* हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि "जब इंसान मर जाता है तो उसके सारे आमाल मुनक़तअ हो जाते हैं मगर तीन अमल का सवाब जारी रहता है जिसका सवाब मुर्दा क़ब्र में भी पाता है

1. सदक़ये जारिया-यानि कोई ऐसी चीज़ सदक़ा कर गया मसलन मदरसे में क़ुरान रखवा दिया या वुज़ू खाना बनवा दिया या पानी का और कोई काम करवा दिया गर्ज़ कि जो उसके मरने के बाद भी बाकी रहे तो उसे सदक़ये जारिया कहते हैं,इसका सवाब मरने के बाद भी मिलेगा

2. इल्म-यानि ऐसा इल्म छोड़ गया या लोगों को सिखा गया जिससे कि लोग फायदा उठाते हों तो उसके मरने के बाद भी जितने लोग उस पर अमल करते रहेंगे क़ब्र में भी उसको सवाब मिलता रहेगा

3. नेक औलाद-यानि जो भी अमले खैर उसकी औलाद करेगी या दुआ करेगी तो क़ब्र में उसके वालिदैन को भी अज्र मिलता रहेगा,और किसी के अमल में कोई भी कमी ना होगी

📕 तिर्मिज़ी,हदीस 1376

*एक बात यहां ज़हन में ये आई कि अक्सर अवाम ये कहती हुई नज़र आती है कि जाहिल आलिम से बेहतर हैं क्योंकि आलिम तो जानकर गुनाह करते हैं और अवाम कम से कम जानती तो नहीं है इसलिए कम गुनाहगार होगी,तो उनकी ये सराहत सरासर गलत और फिज़ूल है अव्वल तो क़ुरान का ही इनकार है अल्लाह फरमाता है कि*

* आलिम और जाहिल बराबर नहीं

📕 पारा 23,सूरह ज़ुमर,आयत 9

* बेशक अल्लाह से वही लोग डरते हैं जो इल्म वाले हैं

📕 पारा 22,सूरह फातिर,आयत 28

*एक में मौला फरमाता है कि आलिम और जाहिल बराबर नहीं तो मतलब ये है कि आलिम बुलंद मनसब है और ना अहल उससे कम,पर अवाम की नज़र में तो वो उल्मा से भी बढ़कर हैं फिर यही नहीं उस पर भी तुर्रा ये कि जाहिल ही अल्लाह से डरते हैं उल्मा नहीं डरते इससे दूसरी आयत का इंकार होता है माज़ अल्लाह,अगर इंकार से मुराद तहक़ीर हो जब तो कुफ्र तक हो जायेगा,अवाम क्या सोचकर ऐसा कहती है उसकी एक मिसाल देता हूं जैसे कि दावत में किसी मौलाना को खड़े होकर खाना खाते देख लिया या पानी पीते देख लिया या और कोई गुनाह करते देख लिया तो अब अपना गुनाह भूलकर उसकी ज़बान पर बस यही आता है कि उससे अच्छे तो हम है कम से कम हम जानते तो नहीं हैं,तो याद रखें कि किसी का कोई दीनी बात का इल्म ना रखना उसे अज़ाब से नहीं बचा सकता

इसको यूं समझिये कि अगर जानकर ज़हर पियेंगे तो मर जायेंगे और अगर अनजाने में ज़हर पियेंगे तो क्या बच जायेंगे,नहीं बिलकुल नहीं,ज़हर ज़हर है चाहे जानकर पियें या अनजाने में वो तो अपना काम करेगा,उसी तरह गुनाह गुनाह है चाहे जानकर करें या अनजाने में अज़ाब दोनों ही सूरत में झेलना पड़ेगा,मगर इसमें भी जाहिल ही ज़्यादा नुकसान उठायेगा क्योंकि वो इल्म से ना आशना है उसे तो पता भी नहीं है कि जो गुनाह वो कर रहा है वो नाजायज़ है या हराम है या माज़ अल्लाह कुफ्र है,लेकिन इल्म वाला अगर चे अपने नफ्स के धोखे में आकर गुनाह करता भी है तो कम से कम उसे इल्म तो होगा कि ये गुनाह किस ज़िम्न में है कोई नेकी करने से मिट जायेगा या तौबा भी करनी होगी,फिर दूसरी बात ये भी कि जिस तरह नमाज़ पढ़ना फर्ज़ है उसी तरह इल्मे दीन सीखना भी फर्ज़ है मतलब नमाज़ के मसले मसायल सीखना भी फर्ज़ है,अब एक शख्स ने नमाज़ के मसले मसायल तो तमाम सीख लिये यानि एक फर्ज़ को अदा कर लिया मगर नमाज़ नहीं पढ़ता तो दूसरे फर्ज़ का तर्क किया तो उसका कुसूरवार हुआ मगर वहीं एक जाहिल ना तो उसने नमाज़ के मसले मसायल ही सीखे और ना ही वो नमाज़ पढ़ता है तो अब बताईये कि कौन ज़्यादा बुरा है जिसने एक फर्ज़ तर्क किया वो या जिसने दो दो फर्ज़ तर्क किया वो

इसको भी मिसाल से समझिये कि एक शख्स रमज़ान शरीफ में रोज़े रखता है मगर नमाज़ नहीं पढ़ता और दूसरा शख्स ना तो रोज़े ही रखता है और ना ही नमाज़ पढ़ता है,तो अब बताईये कि जिसने रोज़ा और नमाज़ दो फर्ज़ तर्क किये वो ज़्यादा गुनहगार है या वो कि जिसने रोज़ा तो रखा मगर नमाज़ नहीं पढ़ी,ज़ाहिर सी बात है कि जो दो फर्ज़ का तारिक होगा वही ज़्यादा गुनहगार है तो उसी तरह इल्म वाला अगर कोई गुनाह करता भी है तो उसको गुनाह सिर्फ इस बात पर होगा कि उसने ये गुनाह क्यों किया मगर वहीं इल्म ना जानने वाले को इस बात पर भी गुनाह होगा कि इल्म सीखा क्यों नहीं फिर इस पर कि ये गुनाह क्यों किया,समझाते समझाते बात बहुत लम्बी हो गई मगर इसका जानना बहुत ज़रूरी है कि खुद मैं बहुत लोगों से अक्सर सुनता रहता हूं कि अवाम आलिम से बेहतर है माज़ अल्लाह,लिहाज़ा जिसका ऐसा अक़ीदा हो वो फौरन तौबा करे,एक बात और इस पूरी बहस से कोई ये ना समझे कि मैं किसी मौलाना के गुनाह करने को जायज़ ठहरा रहा हूं नहीं बल्कि गुनहगार तो वो है ही मगर उससे बड़ा गुनहगार वो है जो वही गुनाह करता है मगर उसका इल्म भी उसको नहीं है

जारी रहेगा...........

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Saturday, 29 April 2017

इमामे आज़म अबू हनीफा


ZEBNEWS*

                       *इमामे आज़म*



* आपका नाम नोअमान वालिद का नाम साबित और कुन्नियत अबू हनीफा है,आप 80 हिजरी में पैदा हुए

📕 खैरातुल हिसान,सफह 70

* हज़रत शेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि आपका ज़िक्र तौरैत शरीफ में भी यूं मौजूद है कि "मुहम्मद सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की उम्मत में एक नूर होगा जिसकी कुन्नियत अबू हनीफा होगी

📕 तआर्रुफ फिक़ह व तसव्वुफ,सफह 225

* खुद हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि "मेरी उम्मत में एक मर्द पैदा होगा जिसका नाम अबू हनीफा होगा वो क़यामत में मेरी उम्मत का चराग़ है

📕 मनाक़िबिल मोफिक,सफह 50

* बुखारी व मुस्लिम शरीफ की हदीसे पाक है हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि "अगर ईमान सुरैया के पास भी होता तो फारस का एक शख्स उसे हासिल कर लेता" इस हदीस की शरह में हज़रत जलाल उद्दीन सुयूती रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि उस शख्स से मुराद इमामे आज़म अबू हनीफा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हैं

📕 तबयिदुल सहीफा,सफह 7

*सुरैया चौथे आसमान पर एक सितारे का नाम है*

* आप ताबईन इकराम के गिरोह से हैं क्योंकि आपने कई सहाबा इकराम की ज़ियारत की है,बाज़ ने 20 सहाबी से मुलाक़ात का ज़िक्र किया और बाज़ ने 26 और भी इख्तिलाफ पाया जाता है,मगर इसमें कोई इख्तेलाफ नहीं कि आपकी सहाबियों से मुलाक़ात ना हुई हो क्योंकि खुद बराहे रास्त आपने 7 सहाबा इकराम से हदीस सुनी है जिनमे सबसे अफज़ल सय्यदना अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हैं,फिर अब्दुल्लाह बिन हारिस,जाबिर बिन अब्दुल्लाह,मअकल बिन यसार,वासला बिन यस्क़ा,अब्दुल्लाह बिन अनीस,आयशा बिन्त अजरद रिज़वानुल्लाहे तआला अलैहिम अजमईन शामिल हैं

📕 बे बहाये इमामे आज़म,सफह 62

* हज़रत दाता गंज बख्श लाहौरी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु लिखते हैं कि एक मर्तबा आपने गोशा नशीन होने का इरादा फरमा लिया था,रात को हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ख्वाब में तशरीफ लाये और फरमाया कि "ऐ अबू हनीफा तेरी ज़िन्दगी अहयाये सुन्नत के लिए है तू गोशा नशीनी का इरादा तर्क कर दे" तो आपने ये इरादा तर्क कर दिया

📕 कशफुल महजूब,सफह 162

* क़ुरान मुक़द्दस को 1 रकात में पढ़ने वाले 4 हज़रात हैं जिनमे हज़रत उसमान ग़नी हज़रत तमीम दारी हज़रत सईद बिन जुबैर और हमारे इमाम इमामे आज़म रिज़वानुल्लाहे तआला अलैहिम अजमईन हैं

📕 क्या आप जानते हैं,सफह 211

* इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह तआला अलैही फरमाते हैं कि आपका पूरी रात इबादत करना तवातर से साबित है और 30 सालों तक 1 रकात में क़ुरान पढ़ते रहे और 40 सालों तक ईशा के वुज़ू से फज्र अदा की,आप रमज़ान में 61 कलाम पाक खत्म किया करते थे एक दिन में एक रात में और एक पूरे महीने की तरावीह में,आपने 55 हज किये

📕 इमामे आज़म,सफह 75

* आलाहज़रत अज़ीमुल बरक़त रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि अगर रूए ज़मीन के आधे इंसानो के साथ इमामे आज़म की अक़्ल को तौला जाए तो इमामे आज़म की अक़्ल भारी होगी

📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 1,सफह 123

* आप जब भी रौज़ए अनवर पर हाज़िरी देते और सलाम पेश करते तो जाली मुबारक से आवाज़ आती व अलैकुम अस्सलाम या इमामुल मुस्लेमीन

📕 तज़किरातुल औलिया,सफह 165

* फिक़ह हनफी पर ऐतराज़ करने वालों और हर बात में बुखारी बुखारी की रट लगाने वालो देखो कि इमाम बुखारी ने इल्म किससे सीखा,इमाम बुखारी के उस्ताज़ हैं इमाम अहमद बिन हम्बल उनके उस्ताज़ हैं इमाम शाफई उनके उस्ताज़ हैं इमाम मुहम्मद उनके उस्ताज़ हैं इमाम अबू यूसुफ और आप के उस्ताज़ हैं इमामुल अइम्मा इमामे आज़म रिज़वानुल्लाहे तआला अलैहिम अजमईन

📕 इमामे आज़म,सफह 195

*आपसे बेशुमार करामतें ज़ाहिर है और बेशुमार वाक़ियात किताबों में मौजूद है,कभी करामत के टापिक में बयान करूंगा इन शा अल्लाह*

* आपका विसाल 2 शाबान 150 हिजरी में हुआ,6 बार आपकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी गयी और क़ब्र पर तो 20 दिन तक नमाज़ होती रही,आपके विसाल पर जिन्नात भी रो पड़े थे

📕 इमामे आज़म,सफह 132

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Friday, 28 April 2017

इल्मे दीन हिस्सा-1


 हिस्सा-1   इल्मे दीन

* अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है "ऐ लोगों इल्म वालों से पूछो अगर तुम्हे इल्म ना हो

📕 पारा 17,सूरह अम्बिया,आयत 7

* और अल्लाह के रसूल सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम इरशाद फरमाते हैं "इल्मे दीन सीखना हर मुसलमान मर्द व औरत पर फर्ज़ है

📕 इब्ने माजा,जिल्द 1,सफह 224

* इल्मे दीन की मजलिस में शामिल होना 1000 रकत नफ्ल पढ़ने से बेहतर है

📕 रुहुल बयान,जिल्द 10,सफह 221

* रात में एक घड़ी इल्मे दीन का पढ़ना पढ़ाना पूरी रात इबादत करने से बेहतर है

📕 अनवारुल हदीस,सफह 114

* जो इल्मे दीन के रास्ते पर है तो वो जन्नत के रास्ते पर है

📕 इब्ने माजा,जिल्द 1,सफह 145

* जो इल्मे दीन की तलब में हो और मौत आ जाये तो वो शहीद है

📕 क्या आप जानते हैं,सफह 583

* जो शख्स इल्मे दीन की तलब में है तो उसके रिज़्क़ का ज़ामिन अल्लाह है

📕 तारीखे बगदाद,जिल्द 3,सफा 398

* जिस ने इल्मे दीन इसलिए सीखा कि लोगों की इस्लाह करे तो ये उसके पिछले तमाम गुनाहों का कफ्फारह है

📕 मिरातुल मनाजीह,जिल्द 1,सफह 203

* एक सहाबिये रसूल हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में हाज़िर थे,मौला ने अपने महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को वही की कि ऐ महबूब इस सहाबी की क़ज़ा का वक़्त आ चुका है चन्द साअत ही बाकी है,आप सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने उन्हें बता दिया पहले तो सहाबी परेशान हुए फिर अर्ज़ की कि या रसूल अल्लाह सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम अब जब कि मेरा वक़्त आ ही चुका है तो मुझे कोई ऐसा अमल बता दिया जाए कि मैं उसमे लगा रहूं और मुझे मौत आ जाये,तो अल्लाह के रसूल सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि "इल्मे दीन सीखने में मशगूल हो जाओ" कि सबसे बेहतर यही है,वो सहाबी इल्म की तलब में लग गए और उसी हालत में उन्हें मौत आई

📕 तफसीरे कबीर,जिल्द 1,सफह 410

ग़ौर कीजिये कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम सामने मौजूद हैं फरमा देते कि यही बैठे रहो और मुझे देखते रहो या ये कि हरम बगल में है जाओ तवाफ करना शुरू कर दो या ये कि मस्जिदे नब्वी में नमाज़ पढ़ना शुरू कर दो,मगर आपने ये सब ना फरमा के ये फरमाया की इल्मे दीन हासिल करने में लग जाओ तो इसी से इल्मे दीन की फज़ीलत का पता चलता है,मगर एक आज का मुसलमान है कि सब कुछ है उसके पास मगर इल्मे दीन से ही कोरा है,अब इल्मे दीन सीखने का ज़रिया क्या है ये भी जान लीजिए

1. मदरसा
2. कुत्ब बीनी
3. इल्म वालों की महफिल

मदरसा हम गए नहीं किताब हम पढ़ते नहीं और जलसों में हम जाते नहीं,तो अब इल्म क्या अल्लाह तबारक व तआला इल्हाम से हमारे दिल में डालेगा,नहीं नहीं नहीं,फिर भी Social media के इस ज़माने में facebook और whatsapp के ज़रिये अगर अल्लाह का कोई बन्दा घंटो मेहनत करने के बाद बैठे बिठाये मोबाइल पर एक islamic post भेज देता है तो लम्बा Msg है कहकर नीचे खसका दिया जाता है,मेरे दोस्तों और अज़ीज़ों मैं सबकी बात नहीं करता मगर ZEBNEWS के Massages कापी पेस्ट वाले नहीं होते हैं कि कहीं से Copy कर लिया और कहीं Paste कर दिया और बस बन गए Group Admin,घंटो मेहनत करने के बाद कितनी ही किताबों में सर खपाने के बाद एक पोस्ट तैयार होती है बदले में आपसे सिर्फ इतना चाहता हूं कि plz msg पढ़ा करें क्योंकि मेरे इस काम की जज़ा कोई दे ही नहीं सकता सिवाए मेरे रब के,ये बात कहने की ज़रूरत इसलिए पड़ी कि मैं देखता हूं कि अक्सर मेरे ग्रुप के ही कुछ लोग बहुत से ऐसे सवाल पूछते हैं जिसका जवाब मैं पोस्ट के ज़रिये या सवाल जवाब में दे चुका होता हूं,मतलब साफ है कि 24 घंटे में एक msg भेजने पर भी कुछ लोग उसे नहीं पढ़ते हैं क्योंकि अगर पढ़ते तो वही सवाल मुझसे नहीं पूछते,फिर जब मैं इस पर कुछ कहता हूं तो लोग बुरा मानते हैं,तो दोस्तों अगर वाक़ई इल्म हासिल करना चाहते हैं तो msg पढ़ें और कोशिश करें उस पर अमल करने की,और अगर एक msg भी नहीं पढ़ा जाता तो फिर ग्रुप में रहने की ज़रूरत ही क्या है,ZEBNEWS को सोशल मीडिया पर चलने वाला सिर्फ एक msg ग्रुप ना समझें बल्कि इसे मैं एक मदरसे की तरह चला रहा हूं और मेरी बस यही एक तमन्ना है कि अपने मरने से पहले किसी एक की इस्लाह कर जाऊं,ग्रुप में मैंने काफी सख्ती कर रखी है किसी को कुछ बोलने की इजाज़त नहीं है ये सब सिर्फ आप लोगों की भलाई के लिए ही है वरना फिर इसमें और बाकी ग्रुप्स में क्या फर्क रह जायेगा,लिहाज़ा मेरी सख्ती को और कभी कभी मेरी सख्त कलामी को नज़र अंदाज़ कर दिया करें

*जज़ाक अल्लाहो रब्बिल आलमीन*

जारी रहेगा...........

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Tuesday, 25 April 2017

हिस्सा-2 मेराज शरीफ

हिस्सा-2  मेराज शरीफ



*हुज़ूर ने खुदा का दीदार किया* 

* आंख ना किसी तरफ फिरी और ना हद से बढ़ी 

📕 पारा 27,सूरह नज्म,आयत 17

मतलब ये कि शबे मेराज हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने अपने रब को अपने सर की आंखों से देखा,उसी देखने को मौला तआला फरमाता है कि ना तो देखने में ही आंख फेरी और ना ही बेहोश हुए,जैसा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम रब के जलवों की ताब ना ला सके और बेहोश हो गए,और इस देखने की तफसील खुद हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इस तरह इरशाद फरमाते हैं कि

* इज़्ज़त वाला जब्बार यहां तक क़रीब हुआ कि 2 कमानों या उससे भी कम फासला रह गया 

📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 1120

* चारों खुल्फा यानि हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ हज़रत उमर फारूक़ हज़रत उस्मान गनी हज़रत मौला अली व अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास अब्दुल्लाह बिन हारिश अबि बिन कअब अबू ज़र गफ्फारी माज़ बिन जबल अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद अबू हुरैरह अनस बिन मालिक और भी बहुत से सहाबा का यही मज़हब है कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने अपने सर की आंखों से रब तआला को देखा 

📕 शिफा शरीफ,जिल्द 1,सफह 119

* इसके अलावा भी दीगर फुक़्हा व अइम्मा का यही मज़हब रहा कि हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने खुदा का दीदार किया 

📕 अलमुस्तदरक,जिल्द 1,सफह 65
📕 फत्हुल बारी,जिल्द 7,सफह 174
📕 खसाइसे कुबरा,जिल्द 1,सफह 161
📕 ज़रक़ानी,जिल्द 6,सफह 118

अब जो लोग ये ऐतराज़ करते हैं कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने खुदा को नहीं देखा बल्कि जिब्रीले अमीन को देखा तो तो मैं उनसे कहना चाहूंगा कि क्या मेरे आक़ा जिब्रील को देखने के लिए सिदरह तशरीफ ले गए थे,अरे जो खुद 24000 मर्तबा मेरे आक़ा की बारगाह में आये हों उन्हें देखना हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के लिए कोई कमाल नहीं,बल्कि वो तो हुज़ूर के ही गुलाम हैं खुद हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि 

* मेरे दो वज़ीर आसमान में हैं जिब्राईल और मीकाईल 

📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 208

वज़ीर किसके होते हैं ज़ाहिर सी बात है कि बादशाह के होते हैं,अगर हुज़ूर फरमाते हैं कि ये दोनों मेरे वज़ीर हैं तो मतलब बादशाह आप खुद हुए,तो हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के लिए ये कोई कमाल की बात नहीं कि जिब्रील को देख लिया बल्कि कमाल यही है कि खुदा को देखा,फिर मोअतरिज़ का उम्मुल मोमेनीन सय्यदना आयशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा का ये क़ौल पेश करना कि "जो ये कहे कि हुज़ूर ने खुदा को देखा तो वो झूठा है" ये क़ौल आपके इज्तेहाद पर था मगर यहां आपके इज्तेहाद से बड़ा हुज़ूर का क़ौल मौजूद है कि खुद आप फरमाते हैं

* मैंने अपने रब को अहसन सूरत में देखा 

📕 मिश्कत,सफह 69

और मुनकिर का क़ुरान की ये दलील लाना कि खुदा को कोई आंख नहीं देख सकती तो इसका जवाब ये है कि इस दुनिया में खुदा को कोई आंख नहीं देख सकती वरना हदीसो से साबित है हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि 

* कल तुम अपने रब को बे हिजाब देखोगे

📕 बुखारी,किताबुत तौहीद,हदीस 7443
📕 इब्ने माजा,हदीस 185

तो जब मैदाने महशर में तमाम मुसलमान खुदा का दीदार करेंगे तो हुज़ूर के लिए क्या मुश्किल रही,तो अब कहने वाला कह सकता है कि वो दुनिया दूसरी होगी जहां खुदा का दीदार होगा तो मोअतरिज़ का ऐतराज़ यहीं से खत्म हो गया और सवाल का जवाब खुद बा खुद मिल गया कि जहां हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने खुदा का दीदार किया था वो दुनिया भी दूसरी दुनिया थी ये दुनिया नहीं थी,एक आखिरी बात ये कि जब भी कोई किसी को अपने यहां दावत पर बुलाए और मेहमान के सामने मेज़बान खुद ना आये तो इसे तौहीन समझा जाता है,उसी तरह ये बात खुदा की शान के बईद है कि वो खुद ही हुज़ूर को बुलाये उनके लिए जन्नत सजाये जहन्नम को बुझा दे हूरो मलक का मेला लगा ले और खुद ही उनके सामने ना आये और अपना दीदार ना कराये ये ना मानने वाली बात है

जारी रहेगा...........
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हिस्सा-1 मेराज शरीफ


       हिस्सा-1  मेराज शरीफ


*तमाम सुन्नियों को शबे मेराज बहुत बहुत मुबारक हो*

* रायज यही है कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को मेराज शरीफ रजब की 27वीं शब में हिजरत से पहले मक्का मुअज़्ज़मा में हज़रते उम्मे हानी के घर से हुई

📕 ज़रक़ानी,जिल्द 1,सफह 355

* हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को 34 बार मेराज हुई 33 बार रूहानी यानि ख्वाब में और 1 बार जिस्मानी यानि जागते हुए

📕 मदारेजुन नुबूवत,जिल्द 1,सफह 288

हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को रात ही रात एक आन में मस्जिदें हराम से मस्जिदे अक्सा ले जाया गया फिर वहां से सातों आसमानों की सैर कराई गयी फिर सिदरह से आगे 50000 हिजाबात तय कराये गए जन्नत व दोज़ख दिखाई गयी और सबसे बढ़कर खुदा का दीदार हुआ,मगर जैसा कि मुनकेरीन की आदत है हर बात का इंकार करने की तो इस पर भी ऐतराज़ किया जाता है कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को मेराज जिस्म के साथ हुई ही नहीं बल्कि ख्वाब में ऐसा हुआ,उनका कहना है कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई 27 साल का सफर एक पल में कर आये,तो इसका जवाब ये है कि अगर खुदा की कुदरत का इक़रार अक़्ल के हिसाब से ही किया जाए तब तो ये भी नहीं हो सकता,ग़ौर करें

मस्जिदें हराम यानि काबा मुअज़्ज़मा से बैतुल मुक़द्दस का सफर करने में 1 महीने से ज़्यादा लग जाते थे जिसकी दूरी 666 मील है

1 मील = 1.60934 किलोमीटर
666 मील = 1.60934 = 1071 किलोमीटर
फिर इतना जाना और वापस आना यानि
1071 + 1071 = 2142 किलोमीटर

अब ये बताइए कि 2142 किलोमीटर का सफर अगर हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम तेज़ घोड़े से भी करते तो एक घोड़ा अगर बहुत ते़ज दौड़े तो उसकी स्पीड 70 किलोमीटर पर घंटे की होगी,इस हिसाब से

2142 / 70 = 30.6

और अगर ऊंट से सफर करते तब,ऊंट की रफ़्तार तो घोड़े से कम ही होती है,मतलब ये कि 30 घंटे से भी ज़्यादा वक़्त लगता आपको आने और जाने में,तो अगर अक़्ल के हिसाब से ही मानना है तो मस्जिदें हराम से मस्जिदे अक़्सा के सफर का भी इनकार करो क्योंकि अगर एक ही रात में हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम आसमानों की सैर नहीं कर सकते जन्नत दोजख नहीं देख सकते खुदा का दीदार नहीं कर सकते तो फिर एक ही रात में काबा से मस्जिदे अक्सा भी नहीं पहुंच सकते,अगर वो नामुमकिन है तो ये भी नामुमकिन है,मगर ऐसा तो कर ही नहीं पाओगे क्योंकि ये नामुमकिन काम उस रात मुमकिन हुआ है,अगर इंकार करोगे तो काफिर हो जाओगे रब तआला क़ुरान में इरशाद फरमाता है कि

* पाक है वो ज़ात जो ले गया अपने बन्दे को रात ही रात मस्जिदें हराम से मस्जिदे अक्सा

📕 पारा 15,सूरह असरा,आयत 1

*अक़्ल से फैसला करने वालो तुम्हारी अक़्ल के परखच्चे उड़ जायेंगे,अगर एक महीने का सफर एक आन में हो सकता है बल्कि हुआ है क़ुरान शाहिद है तो फिर 27 साल का सफर भी एक आन में हो सकता है अगर ये मुमकिन है तो वो भी मुमकिन है,इसके अलावा तीन और दलील है कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को मेराज हुई और जिस्म के साथ हुई*

1. अल्लाह इस आयत में फरमाता है कि अपने बन्दे को ले गया,तो बन्दा किसको कहते हैं इस पर इमाम राज़ी अलैहिर्रहमा फरमाते हैं कि

* अब्द का इतलाक़ रूह और जिस्म दोनों पर होता है

📕 मफातीहुल ग़ैब,जिल्द 20,सफह 295

और इसकी सराहत खुद क़ुरान मुक़द्दस में मौजूद है,मौला फरमाता है कि

* क्या तुमने नहीं देखा जिसने मेरे बन्दे को नमाज़ से रोका

📕 पारा 30,सूरह अलक़,आयत 9

* और ये कि जब अल्लाह का बंदा उसकी बंदगी करने को खड़ा हुआ तो क़रीब था कि वो जिन्न उस पर ठठ्ठ की ठट्ठ हो जायें

📕 पारा 29,सूरह जिन्न,आयत 19

बताइये नमाज़ रूह पढ़ती है या जिस्म या कि दोनों,ज़ाहिर सी बात है की दोनों,तो मेराज में भी हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का जिस्म और रूह दोनों मौजूद थी

2. सारी दुनिया जानती है कि मेराज में हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के लिए बुर्राक़ लाया गया,अगर मेराज रूह की थी तो बुर्राक़ का क्या काम,क्या बुर्राक़ रूह को उठाने के लिए लाया गया था

3. अगर हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को मेराज ख्वाब में होती तो मुनकिर इन्कार क्यों करता,क्योंकि ख्वाब में आसमान की सैर करना कोई कमाल तो नहीं,मतलब ये कि मेराज जिस्म के साथ ही हुई थी

📕 रुहुल बयान,पारा 15,सफह 8

जारी रहेगा...........
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Friday, 21 April 2017

तलाक़ का शरई हुक्म


          ● तलाक़ का शरई हुक्म ●


निकाह से जहां दो अजनबी एक होते हैं वहीं उस रिश्ते को तोड़ देने का नाम तलाक़ है,हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि

* तमाम हलाल चीज़ों में अल्लाह को सबसे ज़्यादा ना पसन्द तलाक़ है

📕 अबू दाऊद,जिल्द 1,सफह 296

हालांकि तलाक़ एक जायज़ चीज़ है मगर इसका इस्तेमाल खास दुश्वारियों और परेशानियों में करने का ही हुक्म है ये नहीं कि बात बात में शौहर अपनी बीवी को तलाक़ देता बैठा रहे,क्योंकि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि

* फिर अगर वो तुम्हे पसंद ना आये तो क़रीब है कि कोई चीज़ तुम्हे ना पसंद हो और अल्लाह उसमे बहुत भलाई रखे

📕 पारा 4,सूरह निसा,आयत 19

मतलब ये कि कोई इंसान सिर्फ ऐबों का मुजस्समा तो नहीं हो सकता अगर उसमे कुछ बुराई होगी तो अच्छाई भी ज़रूर होगी तो अगर औरत में ऐसी कोई खराबी नज़र भी आती है तो शौहर को उसकी खूबियों पर भी नज़र करनी चाहिए,लेकिन अगर फिर भी तलाक़ की नौबत आ ही जाए तो एक ही तलाक़ देनी चाहिए ताकि सुलह समझौते का रास्ता खुला रहे,जैसा कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि

* तलाक़ दो बार तक है फिर भलाई के साथ रोक लेना है या भलाई के साथ छोड़ देना फिर अगर शौहर ने उसे तलाक़ (तीसरी) दी तो अब वो औरत उसे हलाल ना होगी यहां तक कि दूसरे शौहर के पास रहे

📕 पारा 1,सूरह बक़र,आयत 229,230

तलाक़ की 3 किस्में हैं रजई,बाइन,मुगलज़ा

रजई - वो तलाक़ है कि औरत फिलहाल निकाह से नहीं निकलती,हां इद्दत गुज़र जाए और वापस ना लाये तो बाहर हो जाएगी शौहर को इद्दत के अंदर बग़ैर निकाह के उसे लौटाने का हक़ रहता है

बाइन - वो तलाक़ है कि औरत निकाह से तो फौरन निकल जाती है मगर औरत की मर्ज़ी से शौहर फिर उसे निकाह में ला सकता है इद्दत के अंदर हो या इद्दत के बाद

मुगलज़ा - वो तलाक़ है कि औरत निकाह से फौरन बाहर हो गयी अब बग़ैर हलाला के उसके लिए हलाल ना होगी,मुगलज़ा तीन तलाक़ों से होता है अब ये तीन चाहे बरसों के फासले पर दी हो मसलन एक 20 साल पहले दी फिर कुछ दिन बाद एक और देदी अब जब भी तीसरी बार कहेगा तो मुगलज़ा हो जायेगी,या फिर इकठ्ठा दी यानि युं कहा कि मैंने तुझको तलाक़ दी तलाक़ दी तलाक़ दी या युं कहा कि मैंने तुझको 3 तलाक़ दी तो हर सूरत में मुगलज़ा वाक़ेय हो जायेगी,क्योंकि रब ने तीनो तलाक़ों का हुक़्म बयान किया मगर कोई शर्त नहीं लगाई कि एक ही मजलिस में हो या अलग अलग,और इस हुक्म की तामील हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने मुबारक से हो रहा है जैसा कि सहाबियाये रसूल हज़रत फातिमा बिन्त क़ैस रज़ियल्लाहु तआला अन्हा अपना तलाक़ का वाक़िया बयान करती हैं कि

* मेरे शौहर (हज़रत आमिर शोअबी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) ने मुझे यमन के लिए घर से निकलते वक़्त इकठ्ठी 3 तलाक़ दी तो अल्लाह के रसूल सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने तीनो तलाक़ नाफिज़ फरमा दी

📕 इब्ने माजा,सफह 147

इसी तरह 1 साथ 3 तलाक़ों का कई मुआमला ज़मानये नब्वी में पेश आया जिस पर आपने 3 तलाक़ों का ही हुक्म दिया,और बाद के मुहद्देसीन हज़रात ने भी इसी पर अमल किया जिसके लिए काफी हवाले मौजूद हैं मसलन

📕 अबू दाऊद,जिल्द 1,सफह 300
📕 मूता इमाम मालिक,सफह 284
📕 ताहावी,जिल्द 2,सफह 33
📕 फत्हुल क़दीर,जिल्द 3,सफह 469
📕 अहकामुल क़ुरान,जिल्द 1,सफह 388

हां ये अलग बात है की इकट्ठी 3 तलाक़ देना गुनाह है और हालते हैज़ व हालते हमल में तलाक़ देना नाजायज़ है इस पर हुज़ूर ने नाराज़गी का इज़हार भी किया मगर फरमाते हैं कि अगर हालते हैज़ में भी 3 तलाक़ दी तो तीनो नाफिज़ हो जायेगी लेकिन अगर तीन नहीं दी तो रजअत यानि लौटाये दोबारा उसको निकाह में लाना वाजिब है

📕 दारक़ुतनी,जिल्द 2,सफह 433
📕 फतावा रज़वियह,जिल्द 5,सफह 604

* औरत नमाज़ नहीं पढ़ती,शौहर के लिए बनाव सिंगार नहीं करती,शौहर को या घर वालों को तंग करती है इन सूरतों में तलाक़ दे सकते हैं युंही अगर शौहर जिमअ पर क़ादिर नहीं या कोई फरायज़ से औरत को रोकता है तो औरत तलाक़ ले सकती है




📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 8,सफह 5

हलाला - अब अगर मुगलज़ा हो गयी तो बग़ैर हलाला के औरत शौहर पर हलाल ना होगी,मतलब ये कि चुंकि तलाक़ दी है तो तलाक़ की इद्दत गुज़ारेगी जो कि 3 हैज़ है अब ये हैज़ चाहे तीन महीनो में आये या फिर तीन साल में,3 हैज़ आ गए इद्दत पूरी हो गयी या फिर हमल से थी तो हैज़ तो आएगा नहीं तो अब बच्चे की विलादत ही इद्दत है अब अगर बच्चा तलाक़ देने के 1 दिन बाद ही हो जाए इद्दत पूरी हो गयी अब वो दूसरे से निकाह करेगी उससे सोहबत होगी फिर वो तलाक़ देगा तो अब उसकी इद्दत गुज़ारेगी यानि फिर से 3 हैज़,अब पहले शौहर से निकाह कर सकती है,अगर चे देखने में ये कानून सख्त है मगर इससे भी ज़्यादा सख़्त ये है कि एक मर्द सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है मगर अपनी बीवी को ग़ैर के बिस्तर में नहीं बर्दाश्त कर सकता,तो ये सज़ा अस्ल में उस मर्द के लिए है कि जिसने शरीयत को मज़ाक बनाया कि अगर चाहता तो एक तलाक़ देकर फिर से रुजू कर सकता था मगर नहीं अपनी मर्दानगी में या अपनी जिहालत में 3 क्या कइयों तलाक़ दे बैठा तो अब शरीयत से खेलने का अंजाम भी बर्दाश्त करे,ये भी याद रहे कि दूसरे शौहर से सिर्फ निकाह करके तलाक़ ले लेने से वो निकाह नहीं होगा बल्कि एक बार सोहबत करनी फर्ज़ होगी,और ये भी याद रहे कि अगर बग़ैर हलाला किये शौहर ने अपनी बीवी को रखा तो जो कुछ होगा सब ज़िना खालिस होगा और बच्चे सब हरामी पैदा होंगे

📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 8,सफह 126

अब जिस मसले पर क़ुरान हदीस और इज्माअ सबका मुत्तफिक़ फैसला हो उस पर कुछ जाहिलों की वजह से इन्कार नहीं किया जा सकता और क़यामत तक उसमे फेर बदल नामुमकिन है,चाहे कुछ नाम निहाद मुसलमान हों या फिर काफिरो मुर्तद लोग जो भी इसमें फेर बदल की कोशिश करेगा वो ज़िल्लतों रुस्वाई के गढ़े में समा जाएगा,अल्लाह ने जो क़ानून हमारे लिए बनाया है उसमें बिला शुबह भलाई ही भलाई है,जो जाहिल औरतें आज modern बनकर आज़ादी का हक़ मांग रहीं हैं वो जाकर ग़ैर मुस्लिमों की औरतों का हाल देखें फिर फैसला करें

! देखें कि गैरों के मुक़ाबले इस्लाम में तलाक़ का % कितना है
! देखें कि ग़ैरों के मुकाबले इस्लाम में rape का % कितना है
! देखें कि ग़ैरों के मुकाबले इस्लाम में कितनी बच्चियों को पेट मे मारा जाता है
! देखें कि ग़ैरों के मुकाबले इस्लाम में कितनी बहुओं को जिंदा जलाया जाता है
! देखें कि ग़ैरों के यहां कितना हक़ औरतों को हासिल है और इस्लाम में कितना

*लिहाज़ा ऐसी बे ग़ैरत औरतों और जाहिल मर्दों और ऐसी सरकार की कोई भी बात या क़ानून जो कि इस्लाम के खिलाफ होगा हरगिज़ हरगिज़ हरगिज़ हमें मंज़ूर नहीं*

*तलाक़ की तफ्सीली मालूमात के लिए बहारे शरीयत हिस्सा 8 का मुताला किया जाए*

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